"मेरे मन के कोटर में बैठे नर्म,कोमल अनछुये छोटे छोटे भावों को संवारने, सजाने और उन्हें अलंकृत करने में एक बहुत मीठी सी तृप्ति और परम सुख की अनुभूति होती है ...जो गाहे बगाहे अलग अलग सुन्दर शब्दों में ढल कर पन्नों पे उतर आती है..........."

Friday, 10 July 2015

शिकायतें


बाद मुद्दतों के

अभी तलक
वो तमाम शिकायतें
वहीँ , वक़्त के उसी मोड़ पर
किसी मजबूत मिनार की तरह
खड़ी मिलती हैं
जहाँ से दो ज़िदगियों ने
चुक गए प्रेम की बैसाखी
का सहारा लेने से ज़्यादा
बेहतर समझा था
लड़खड़ाते क़दमों से
अपने-अपने क्षितिज को
तलाश लेना ....

गौर से देखो
तो दिख जाती हैं
कि !
ढह गयीं हैं कुछ ईंटें
गुस्से , अहंकार और बदसलूकी की
और चढ़ गयी है तमाम गर्द
 परत-दर-परत
दुःख , खीझ , आत्मग्लानि और पछतावे की ...

लेकिन फिर भी शिकायतें हैं कि
न उखड़ती है , न ढहती हैं
खड़ी है वहीँ
बिना डिगे ...........बड़ी मुस्तैदी से
रिश्तों में वापसी की संभावना को
ख़ारिज करते हुए ....!!!!

Thursday, 2 July 2015

कविता



----सुई बन , कैंची मत बन-------
बचपन में, जब कभी
हम भाई-बहिन
आपस में झगड़ते थे
छोटी सी बात पर
माँ-माँ चिल्लाते थे
घर की परेशानियों से जूझती
पैसे की तंगी से उलझती
हमें बेहतर जीवन
देने को तत्पर रहती
माँ !!
मेरा हाथ पकड़ती
और
हमेशा की तरह
वही जाना-पहचाना
वाक्य दोहराती .......
"
सुई बन ,कैंची मत बन"
तब मेरा बालमन
इसे माँ की डांट समझ
कुछ समय बाद
सहज ही भूल जाता .....
आज उम्र के इस दौर में
एक सफल गृहणी का
कर्त्तव्य निभाते हुए ,
संयुक्त परिवार को
एक सूत्र में बांधते हुए
माँ के वाक्य में छुपे
गूढ़ अर्थ को जान पायी हूँ ....
आज जान गयी हूँ ...
कि , कैसे-----
सुई ... दो टुकड़ों को एक करती है
और
कैंची ...एक के दो टुकड़े करती है .....!!!

Tuesday, 14 October 2014

गुलदस्ता



छुड़ा रहे थे
जब तुम अपना हाथ
वक़्त बुन रहा था
एक गुलदस्ता
संग तुम्हारे बिताये
ख़ुशनुमा लम्हों के तिनकों से
कि !
वक़्त मुहैया करा देता है
कुछ राहतें भी.... !!!

उस दिन
कहा था तुमने
कि !
अक्सर गुलदस्ते
सूख जाया करते हैं
लेकिन ...
जानती हूँ मैं
कि !
पीड़ा की खाद
और बिछोह की नमी  रखेगी
गुलदस्ते में सजे खूबसूरत लम्हों को
सदा यूँ ही हरा-भरा ....!!

Tuesday, 30 September 2014

आदिशक्ति माँ




शक्ति का हर स्वरुप माँ का है रूप युगों युगों से ही सदानीरायें भी कहलाती हैं माँ ....! जब-जब हुई चर्चा शक्ति की उभर आई तस्वीर सामने स्त्री की और मन की आँखों से जब देखो तो हर स्त्री रूप में झलकती है माँ ...! शक्ति रूपा माँ समस्त सृष्टि की जननी जब-जब पुरुष ने आदर और सम्मान भाव को भूल स्त्री को भोग्या समझा तब-तब शक्ति रूपा बनी है संहारिणी माँ ....! एक शक्ति स्वरूपा बसती है हमारे घर में बनकर हमारी माँ प्रेम और ममता की मूरत बिना कहे समझ जाती है हमारी भूख और जरूरत सुख-दुःख सब जान लेती रहती परेशानियों से अवगत जीवन के कठिन दौर में दोस्त बन साथ निभाती माँ ...! माँ तुझे प्रणाम !!!





Monday, 22 September 2014

उजाले




ज़मीं अंधेरों की है

तो क्या है ..
.
मुझे ये यक़ीन है

कि !

इस बार

लम्बे समय तक

ठहरेंगे उजाले

क्योंकि !

हर दिन,

एक नयी सुबह के साथ

उम्मीद की मिटटी में

रोप देती हूँ

मैं इक नन्हा पौधा

रौशनी का ....!!!!

एक हौसला अब जगमगाने को हैं )